उत्तराखंड मीडिया के अली बाबा जिनके नाम लिखा ये खत Uttarakhand Media Ali Baba

उत्तराखंड मीडिया के अली बाबा जिनके नाम लिखा ये खत Uttarakhand Media Ali Baba :-उत्तराखंड के पत्रकार साथियों सूचना निदेशालय में अधिकारियों की मनमानी, भ्रष्टाचार व लूटो और खाओ खिलाओ की नीति से प्रभावित हुए पत्रकारों के लिए अब अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का वक्त है। प्रदेष के मुख्यमंत्री को सूचना विभाग के अधिकारियों की करतूतों से अवगत कराने की जरूरत है। जिससे सूचना निदेशालय में अमूल-चूल परिवर्तन हो सके, और अधिकारियों द्वारा मुख्यमंत्री को भ्रंमित करने से बचाया जाय।
वहीं विज्ञापन मान्यता कमेटी जिसमें कांग्रेस मानसिकता के तथाकथित पत्रकार शामिल हैं। जिनका अब भाजपा शासन में कोई औचित्य नहीं रहना चाहिए। उन्होंने भाजपा और मुख्यमंत्री की छवि खराब करने के लिए प्रदेश के समाचार पत्रों के मालिकों यहां तक कि 33-.40 वर्षों से नियमित रूप से प्रकाशित हो रहे समाचार पत्र तथा वर्षों से पत्रकारिकता करने वालों के साथ जो अन्याय व अवैधानिक निर्णयों को थोपा गया हैं।

उसे पूरे प्रदेश के पत्रकार जगत ही नहीं उनसे जुड़े लोगों में भारी रोष व्याप्त है। विज्ञापन मान्यता समिति में शामिल जिन तथाकथित पत्रकारों के समाचार पत्रों को विज्ञापन की सूचीबद्धता हेतु नवीनीकृत किया गया है। उनके समाचार पत्र सूचना विभाग की नीति पर खरे नहीं उतरते तो फिर नवीनीकरण कैसा? सूचना विभाग के अधिकारियों को चंद अखबारों को ही विज्ञापन जारी करना है। तो नई विज्ञापन नीति 2015-16 को लागू करने के लिए इतनी भारी भरकम मशक्त क्यों करनी पड़ रही है। क्या सूचना विभाग के अधिकारी प्रदेश में भाजपा की त्रिवेन्द्र सरकार को विफल करने का षड़यंत्र रच रहे हैं। मुख्यमंत्री को इस दिशा में गंभीरता से सोचकर पत्रकार संगठनों को बुलाकर राय-मशविरा कर के सूचना विभाग में अमूल-चूल परिवर्तन करना जरूरी हो गया है।

रोचक तथ्य यह भी है कि सूचना विभाग द्वारा वर्ष 2016 में परिशिष्ट.2 विज्ञापन की सूचीबद्धता हेतु नवीनीकरण आवेदन पत्र एक वर्ष पूर्व जिसमें जानकारी व सभी पत्रों के साथ पत्रावलियां सूचना विभाग में उपलब्ध कराई गई थी जिसकी रिसीव भी पत्रकारों के पास मौजूद होंगी तो फिर पत्रावली किस षड़यंत्र के तहत गायब करा दी गई एैसे ही सैकड़ों के तादात में गायब कराई गयी क्यों कराई गई और जिन समाचार पत्रों को स्वीकृति दी गई उनकी पत्रावली कैसे पूरी मिल गई। लगता यही है कि यह सब जानबूझकर सोची समझी साजिश के तहत किया गया होगा और प्रदेश मुख्यमंत्री को छोटे से लेकर बड़े.से बड़े अधिकारियों ने सच्चाई से जान बूझकर महरूम रखने का कार्य किया क्योंकि मुख्यमंत्री द्वारा इस विषय पर यह कहना कि मेरे संज्ञान में नहीं था तथा सचिव एवं महानिदेशक द्वारा भी अपनी असमर्थता जाहिर करना प्रदेश सरकार की कार्य प्रणाली में आश्चर्य का विषय बनाता जा रहा है।

 एैसा करना क्या भाजपा सरकार व अधिकांश पत्रकारों के हित में कभी अच्छा हो सकता है। जो समाचार पत्र लगातार नियमित रूप से प्रकाशित होरहे है और विभाग द्वारा भी उन्हें विज्ञापन प्रकाशित करने को दिया जा रहा है फिर अचानक सूचीबद्धता करने के लिए जांच करते वक्त उनकी पत्रावली के अभिलेख गायब कैसे हो गये यह भी जांच का विषय है मुख्यमंत्री स्वयं सूचना विभाग के मंत्री हैं इसलिए उन्हें स्वयं इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए,न कि अधिकारियों के द्वारा बहकावे में आकर कोई निर्णय लें।

अब प्रश्न उठता है कि जिन समाचार पत्रों को विज्ञापन मान्यता की बैठक में उन्हें नवीनीकृत किया गया है एैसे समाचार पत्रों की गहन जांच बाहरी सक्षम एजेंसियों से हांेनी चाहिए, क्या एैसे समाचार पत्रों के स्वामी यह समझते हैं कि जो बदले की भावना व मनमानी तथा अन्याय पूर्ण निर्णय थोप कर के वह अपने समाचार पत्रों में निदेशालय के लोगों से सांठ.गांठ कर भारी धनराशि के विज्ञापन लेकर मालामाल हो जायेंगे, क्या उनकी पोल पट्टियां आये दिन नहीं खुलेंगी अगर ऐसा सोचते हैं तो वह गलफहमी में जी रहे होंगे। सभी पत्रकारों की कलम की स्याही सूखी नहीं हैं। सूचना निदेशालय में होते रहे भ्रष्टाचार पूर्वक कार्य प्रणाली प्राथमिकता से लागातार उठाया जायेगा। प्रत्येक माह कम से कम 100 सांसदों को प्रदेश में हो रही एैसी कार्यगुजारियों से अवगत कराने का कार्य बेखूबी किया जायेगा।

लम्बे समय से वरिष्ठता के नाम पर अधिकारियों द्वारा एक के बाद एक प्रमोशन लिये जाते रहे परन्तु सूचना तंत्र में वरिष्ठ पत्रकारों को जानबूझकर सोची.समझी साजिश के तहत लगातार अवहेलना की जाती रही और अब वरिष्ठ पत्रकारों के समाचार पत्र भी अन्यायपूर्ण अवैधानिक निर्णयों की बलि चढ़ाने पर आमदा हो गये। पत्रकार कल्याण के नाम पर प्रदेश मुख्यमंत्रियों को सच्चाई से महरूम रखा जाता रहा है।लंबे समय से संवादहीनता बनाकर मनमानी का तौर बनाये रखा।अधिकांश पत्रकारों का शोषण करते रहे।

सूचना निदेशालय में फैले व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी उत्तराखंड में जन्में वर्षों से पत्रकारिकता करने वाले तथा वर्षों से नियमित समाचार प्रकाशित करने वाले पत्रकारों को समाप्त करने की साजिश भरा षड़यंत्र रचा जाता रहा। विदेश यात्राओं, देश में यात्रियां, होटलों, टैक्सियों चाय नाश्ता,गिफ्ट खरीददारी और विज्ञापनों में करोड़ों रूपये की सेटिंग व बंदरबांट जिसमें चंद चेहतो को लाभ पहुंचाने का खेल खेला जाता रहा।फर्जी डीएवीपी रेट बनाकर विभागीय कर्मचारियों से मिलकर भारी भरकम राशि का भुगतान किये गये हैं जिसमें कुछ कर्मचारी व अधिकारी संलिप्त रहे हैं जो इस प्रकरण में दोषी हैं।

 उनके वेतन तुरन्त रोके जायें भुगतान की गई रकम वसूली जाय तथा क्रिमनल केस दायर किये जायें तथा जिन.जिन समाचार पत्रों को एैसे भुगतान किये गए उनके समाचार पत्र ब्लैक लिस्ट किये जायें तथा उन पर भी क्रिमनल मुकद्दमें कायम किये जायें।सूचना निदेशालय कार्यप्रणाली से भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री की छवि ही नहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की छवि भी धूमिल होने का कार्य अन्याय पूर्ण अवैधानिक निर्णय थोपने से जहां होगी वहीं एैसी कार्यप्रणाली अगर चलती रही तो क्या जनप्रिय व सफल मुख्यमंत्री कभी बन पायेंगे।

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