खनन - शराब में 'उलझी' नवेली सरकार ‘सियासत अफसरों की ‘रियासत’ New Government Trouble in Mining Alcohol Case

खनन - शराब में 'उलझी' नवेली सरकार ‘सियासत अफसरों की ‘रियासत’ New Government Trouble in Mining Alcohol Case:- देहरादून पिछली हरीश रावत सरकार की बात करें तो खनन और शराब को लेकर वह पूरे कार्यकाल के दौरान खासी बदनाम रही। सच तो यह है कि दो-ढाई साल के कार्यकाल में हरीश सरकार खनन और शराब से ही ‘खेलती’ रही। अंतत: उसे सत्ताच्युत होकर इसका भारी खामियाजा चुकाना पड़ा। इसके बाद जब प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो लगा कि वह पिछली सरकार की गलतियों से सीख लेगी और खनन तथा शराब के मुद्दे पर फूंक-फूंक कर कदम बढाएगी। लेकिन ऐसा होने के बजाय यह सरकार भी पहले दिन से ही खनन और शराब में उलझी हुई है। इससे एक बात तो साफ हो गई है कि प्रदेश में सरकार भले ही किसी भी दल की हो, खनन और शराब ही सरकार की प्राथमिकता है।

 तर्क यह हो सकता है कि इसकी सबसे बड़ी वजह है, इनसे प्राप्त होने वाला राजस्व। मोटे अनुमान के मुताबिक प्रदेश को शराब के व्यवसाय से प्रतिवर्ष तकरीबन 1500 करोड़ तथा खनन से लगभग 400 करोड़ रुपये के करीब राजस्व मिलता है। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि सरकारी खजाने के अतिरिक्त नेताओं और नौकरशाहों की जेब भरने में खनन और शराब की बड़ी भूमिका है। जितना राजस्व सरकारी खजाने में आता है उससे कहीं ज्यादा के इसमें अवैध कमाई है, शराब और खनन की बदौलत ही उत्तराखंड में सफेदपोशों की ‘सियासत’ और तमाम अफसरों की ‘रियासत’ चलती है। बहरहाल विधानसभा चुनाव के लिए हुए प्रचार के दौरान जब भारतीय जनता पार्टी ने ‘डबल इंजन की सरकार’ के नाम पर वोट मांगे तो उम्मीद की गई कि सत्ता में आने पर वह राजस्व के लिए खनन और शराब के बजाय अन्य विकल्पों की तरफ देखेगी, लेकिन ऐसा अभी तक तो दिखाई नहीं दे रहा।

सरकार की नजर में अभी भी खनन और शराब ही राजस्व बढाने के सबसे बड़े स्रोत हैं। लेकिन इन दिनों तो इन दोनों को लेकर प्रदेशभर में हाहाकार मचा हुआ है। खनन की बात करें तो नैनीताल उच्च न्यायालय ने प्रदेश भर में होने वाले खनन पर चार महीने के लिए रोक लगा दी है। हाईकोर्ट के इस आदेश से घबराई राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश को चुनौती देने का फैसला कर चुकी है। यही नहीं कमाई बढ़ाने को सरकार और छोटे नदी खालों में खनन खोलने की तैयारी में है। शराब की बात करें तो तकरीबन तीन महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में सभी राष्ट्रीय राजमार्गों तथा राज्यों के मुख्य सड़क मार्गों से पांच सौ मीटर की दूरी तक स्थित सभी शराब की दुकानों तथा मयखानों (बार) को नए वित्तीय वर्ष, एक अप्रैल से पहले कहीं दूसरी जगहों पर शिफ्ट करने का आदेश दिया।

 इस आदेश के जारी होने के बाद जैसे ही इसके तामील की तारीख आई प्रदेश में हाहाकार मच गया। इसकी वजह यह रही कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अमली जामा पहनाने के लिए किसी भी तरह की तैयारी नहीं की हुई थी। एक बार तो यह लगा कि सरकार इसकी आड़ में राज्य में वर्षों पुरानी शराबबन्दी की मांग पूरी कर देगी । लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, सरकार को उम्मीद थी कि आखिरी वक्त में राहत मिल जाएगी । राहत नहीं मिली तो आखिरी दिन दुकानें बिना तैयारी के शिफट करायी जाने लगी, नतीजा जो दुकानें राजमार्गों से हटीं उनमें से अधिकांश लोगों के विरोध के चलते दूसरी जगहों पर खुल ही नहीं पाईं। जबकि दूसरे राज्यों की बात करें तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का पालन करने के लिए पहले से ही पूरी तैयारी की हुई थी।

नतीजा यह है कि सरकार ना दुकानें खुलवा पा रही है ना बन्द ही करा पा रही है, हर दिन करोडों का राजस्व नुकसान हो रहा है ल इसके अलावा नैनीताल हाईकोर्ट से आए एक और आदेश ने भी राज्य सरकार की मंसा पर सवाल खड़ा किया है । इस आदेश के जरिए नैनीताल हाईकोर्ट ने प्रदेश के तीन जिलों चमोली, रुद्रप्रयाग तथा उत्तरकाशी में शराब की बिक्री पर पाबंदी लगा दी थी । लेकिन इससे होने वाली राजस्व हानि का हवाला देते हुए राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील लगाई और इस आदेश के विरुद्ध स्टे ले आई।


नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश के बाद कहां तो जनता यह उम्मीद कर रही थी कि इस आदेश को आधार बना कर राज्य सरकार धीरे-धीरे ही सही, प्रदेश में पूर्ण शराबबंदी की तरफ बढेगी, लेकिन ऐसा करने के बजाय सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने का विकल्प चुना है। इससे साबित होता है कि प्रदेश को पूरी तरह शराबमुक्त करने का सरकार का वादा, किसी फौरी बयान से ज्यादा कुछ नहीं है। नैनीताल हाईकोर्ट के निर्णय के बहाने ही सही, सरकार के पास शराबबंदी को प्रोत्साहित करने का बड़ा अवसर था, जिसे उसने गंवा दिया । कुल मिलाकर अभी तो सरकार खनन और शराब में ही उलझी हुई है। कहना मुश्किल है कि सरकार इससे बाहर भी निकल पाएगी या नहीं?

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