गंगोत्री धाम के खुले कपाट आस्था की यात्रा पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब Gangotri Dham kapat open

गंगोत्री धाम के खुले कपाट आस्था की यात्रा पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब Gangotri Dham kapat open:-
गंगोत्री आस्था का उत्साह मौसम की ठंडी हवा चार धाम यात्रा का आगाज़ कुछ इसी तरह का नज़ारा गंगोत्री धाम में दिखाई दिया। गंगोत्री धाम के खुले कपाट आस्था की यात्रा पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब, उत्तराखंड में चार धाम यात्रा को लेकर राज्य सरकार भी अपनी तैयारी पूरी कर चुकी है उत्तराखंड की चार धाम यात्रा में इस बार पहला अवसर होगा जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केदारनाथ के दर्शन करेंगे राज्य को भी उम्मीद है की मोदी वहाँ कोई बड़ी योजना पर अपनी हामी भर सकते है।

शुक्रवार को अक्षय तृतीया पर गंगोत्री, यमुनोत्री धाम के कपाट खुलते ही चार धाम यात्रा शुरू हो गयी ।  गुरुवार को दोपहर बाद शीतकालीन प्रवास स्थल मुखवा से गंगा की डोली गंगोत्री के लिए रवाना हुई जिस का स्वागत वहाँ पहुंचे तीर्थ यात्रियों ने भी किया।गौरतलब है कि केदारनाथ के कपाट तीन और बदरीनाथ के छह मई को खुलेंगे। सैकड़ों श्रद्धालुओं के साथ सेना के बैंड की धुन के बीच डोली जब गंगोत्री धाम पहुंची तो वहाँ धार्मिक आस्था का अटूट विश्वाश दीखता नज़र आया है गंगोत्री मंदिर समिति के सचिव सुरेश सेमवाल ने बताया कि ठीक 12.15 बजे धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए ।

यमुनोत्री धाम में कपाट खोलने की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं यमुनोत्री मंदिर के सचिव कीर्तिश्वर उनियाल ने बताया कि सुबह सवा नौ बजे यमुना की डोली शीतकालीन प्रवास स्थल खरसाली से प्रस्थान करेगी और ठीक सवा बारह बजे धाम के कपाट खोल दिए गए।

मान्यता है कि गंगोत्री धाम वह स्थान है जिसे धरती पर अवतरित होते समय मां गंगा ने सबसे पहले छुआ था। गंगाजी का मंदिर समुद्र की सतह से 3042 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां का वातावरण बेहद आकर्षक और मनोहारी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्री रामचंद्र के पूर्वज रघुकुल के चक्रवर्ती राजा भगीरथ ने यहां एक पवित्र शिलाखंड पर बैठकर भगवान शंकर की तपस्या की थी। मान्यता है कि देवी भागीरथी (गंगा) ने इसी स्थान पर धरती का स्पर्श किया। ऐसी भी मान्यता है कि पांडवों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्मिक शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ का अनुष्ठान किया था।

यहां शिवलिंग के रूप में एक नैसर्गिक चट्टान भागीरथी नदी में जलमग्न रहती है। कहा जाता है कि इसके दर्शन से दैवीय शक्ति की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव इस स्थान पर अपनी जटाओं को फैला कर मां गंगा के वैग थामने के लिए बैठ गए थे। उन्होंने अपनी घुंघराली जटाओं में लपेट दिया। शीतकाल के आरंभ में जब गंगा का स्तर काफी अधिक नीचे चला जाता है, तब इस पवित्र शिवलिंग के दर्शन होते हैं। प्राचीन काल में यहां मंदिर नहीं था। भागीरथी शिला के निकट एक मंच था, जहां यात्रा काल में तीन-चार महीनों के लिए देवी-देताओं की मूर्तियां रखी जाती थी।

गंगोत्री से 19 किलोमीटर दूर गौमुख स्थिति है। यह गंगोत्री ग्लेशियर का मुहाना है। कहते हैं कि यहां के बर्फिले पानी में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं। गंगोत्री से यहां तक की दूरी पैदल पूरी की जाती है। चढ़ाई उतनी कठिन नहीं है और कई लोग उसी दिन वापस भी आ जाते हैं। गंगोत्री में कुली भी उपलब्ध होते हैं।

गंगोत्री धाम उत्तरकाशी से 100 किमी की दूरी पर स्थित है। गंगा मैया के मंदिर का निर्माण गोरखा कमांडर अमर सिंह थापा द्वारा 18वी शताब्दी के शुरुआत में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। माना जाता है कि जयपुर के राजा माधो सिंह द्वितीय ने 20वीं सदी में मंदिर की मरम्मत करवायी।

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