डिफेंस कॉलोनी- एक अभिभावक का शिफ्ट होना Defense Colony - Being a Guardian

डिफेंस कॉलोनी-  एक अभिभावक का शिफ्ट होना:- डिफेंस कॉलोनी उदास है टीएसआर के मुख्यमंत्री बनने से पहले लगभग पन्द्रह दिन तक यहां खूब भीड़ थी। लेकिन अब कॉलोनी पुरानी दशा मे आ गई। या यूं कहें कॉलोनी के अभिभावक त्रिवेन्द्र सिंह रावत के देहरादून के सबसे बड़े अधिकारिक घर जाने से उदास है। सीएम बनने से पहले टीएसआर को मैने कई बार दूर से शाम- सुबह वाक करते देखा। शायद वे इसलिए भी फिट हैं। डिफेंस कॉलोनी का वैसे वेलफेयर सोसायटी का रिटायर्ड कर्नल अध्यक्ष होता है लेकिन त्रिवेन्द्र जी सालो से  सामाजिक अध्यक्ष थे। उन्हे करीब से जानने वाले बताते हैं कि वे संपूर्ण कालोनी मे दुख सुख के भागीदार रहे। और उंगलियो मे जानते हैं कि कौन कहां रहता है।और किसका मकान है। वैसे यह भी कहा जाता है कि डोईवाला विधानसभा क्षेत्र में कौन सा घर कहां है और कौन रहता है सब टीएसआर को पता है। इससे पहले वे सुमन नगर धर्मपुर मे रहते थे। बुनियाद वहीं पडी।

डिफेंस कॉलोनी कि यह खासियत है यहां हरियाली और  एक सौ बीस फिट चौडी सड़क है।कहीं साठ फिट है।  सैर करते यहां दुनिया के बारे सुकून से सोचा जा सकता है। जैसे टीएसआर ने बहुत पहले यहां चुपचाप बडी खामोशी के साथ पूरे प्रदेश के लिए सोच लिया था। जो कि सोचा हुआ दो पन्द्रह बीस दिन पहले पूरा हुआ। मेरा अनुभव कहता जैसे वे झारखंड प्रदेश जो उत्तराखण्ड से तीन गुना बड़ा है के प्रदेश प्रभारी टीएसआर बनाए गए,तो डिफेंस कॉलोनी से लेकर जौलीग्रांट एयरपोर्ट तक आते-जाते समर्थक से हो हल्ला कराते अखबार टीवी मे बने रहते, इतना आगे न जाते। क्योंकि ज्यादा बडे बनने का प्रचार घातक होता है। डिफेंस कॉलोनी को कभी मालूम नहीं चला कि यहां किसी प्रदेश का प्रभारी भी रहते हैं उनके लिए चप्पल मे चलते वे त्रिवेन्द्र ही थे।


टीएसआर की जगह कोई और नेता  होता झारखंड जाते पहली बाइट (इंटरव्यू) डिफेंस कॉलोनी, फिर जोगीवाला, फिर डोईवाला फिर फिर  एयरपोर्ट घुसते, फिर नई दिल्ली, फिर रांची में देते । और शाम को पत्रकारो को फोन करते  कि क्या हुआ?  कब आएगा ? त्रिवेन्द्र ने इन सब बातो पर न पडकर चुपचापअपना दायित्व निभाया।
वे समय-समय पर जाते रहे और दिल्ली को रिपोर्ट देते रहे|

यही वजह रही उनके मित्र झारखंड के सीएम चुनाव मे चुपचाप डोईवाला आए और चले गए।जब वे प्रभारी बनाए गए दिल्ली के बडे नेता और उत्तराखंड के दिमाग दार लोगो ने सोच लिया था 2017 के बीजेपी के सीएम वे हैं हुआ भी ऐसा ही। उत्तराखण्ड मे टीएसआर से और भी  बीजेपी के बड़े नेता हैं लेकिन कोई किसी प्रदेश का प्रभारी नहीं है।प्रभारी भी वे जाजू जी जैसे नहीं थे वे झारखण्ड मे सरकार और संगठन में धर्मेंद्र प्रधान और नड्डा जैसी हैसियत रखते थे।

यूपी के लोक सभा चुनाव में अपार सफलता ने उनका कद बढा दिया था। वे बडे-बडे वास्तविक चैनल मे आने लग गए। क्योंकि दिल्ली के बडे पत्रकारो को बडा नेता संकेत मे बता देते हैं। वहां पत्रकार अपने या संस्थान के खर्चे पर फाइव स्टार मे नेता को बुलाते हैं और तब कौन कहां जाएगा आएगा से वाकिफ होते हैं। मैने तब  लिखा था  त्रिवेन्द्र ई टीवी से एनडीटीवी तक। इसके बाद काफी समय मिला था एक बार उप चुनाव में गए हरीश रावत की मशीनरी से वे हार गए लेकिन तमाम अफवाह के बावजूद वे रिकॉर्ड वोटो से जीते। और अमित शाह  दी हुई जुबान खरे उतरे। खैर डिफेंस कॉलोनी को बहुत याद आएगी , उनके आठ किलोमीटर जाने से।

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