मोदी जी करेंगे 'जिक्र’ तो ही होगी 'फिक्र' Modi Will Mention then Every Body Will Be Worry

मोदी जी करेंगे 'जिक्र’ तो ही होगी 'फिक्र' Modi Will Mention then Every Body Will Be Worry:- लगता है कि पीएम नरेंद्र मोदी जिस समस्या का जिक्र नहीं करेंगे, उसका तो मानो समाधान ही संभव नहीं है। ऐसा महौल बनता जा रहा है कि मोदी जिसका जिक्र करेंगे वही समस्या है, और सिस्टम वहीं से समाधन की शुरूआत करेगा। देहरादून को ही देखें, तो इन दिनों रिस्पना नदी की चिंता को लेकर सीएम से लेकर महापौर तक हरकत में हैं। रातों-रात रिस्पना और बिंदाल नदी उनकी प्राथमिकता में शामिल हो गई है।

रिस्पना में गंदगी के साथ-साथ तमाम दूसरी समस्याएं भी सिस्टम को दिखने लगी हैं। जो सिस्टम अभी तक सोया हुआ था वो अचानक सक्रिय हो उठा है। अब न तो संसाधनों की कमी का रोना रोया जा रहा है, और न ही बजट न होने का बहाना बनाया जा रहा है। अब तो सब रिस्पना-बिंदाल को संवारने के लिए बेताब दिख रहे हैं। अफसरों के पेंच भी कसे जा रहे हैं। नदियों के किनारे बिखरा कूड़ा भी उठ रहा है। आठ साल से जो महापौर इन दोनों नदियों की दुर्दशा से अच्छी तरह वाकिफ होने के बावजूद आंख-कान बंद किए बैठे थे, उनकी भी अब मानो ‘कुंडिलिनी’ जागृत हो गई है।

अब वो भी गंदगी को लेकर रिपोर्ट तलब करने लगे हैं। सिस्टम की पिछले तीन-चार दिनों की चाल ‘फील गुड’ कराने लगी है। खैर, सिस्टम का अचानक रिस्पना और बिंदाल को लेकर हरकत में आना भले ही शुरुआती दौर में अच्छा लग रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि इस सक्रियता ने सिस्टम के साथ-साथ सिस्टम चलाने वालों की भी पोल खोल कर रख दी है। दरअसल रिस्पना और बिंदाल को लेकर सिस्टम हरकत में तब आया जब पीएम मोदी ने अपने प्रचलित कार्यक्रम ‘मन की बात’ में देहरादून की एक बिटिया गायत्री के गुस्से का जिक्र किया। गायत्री ने रिस्पना नदी में फैली गंदगी को लेकर पीएम के मन की बात कार्यक्रम में अपने मन की बात भेजी थी, जिसमें उसने गुस्सा भी व्यक्त किया। बकौल गायत्री, वह यह बात आम नागरिकों से लेकर जिम्मेदार लोगों तक पहुंचा चुकी थी, लेकिन न सिस्टम में सुधार आया और न किसी को कोई फर्क पड़ा। उनकी बात का असर न तो लोगों पर हुआ और न ही सिस्टम पर । लेकिन प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में इसका जिक्र होते ही मानो ‘क्रांति’ हो गई।


जिस गायत्री को कोई नहीं जनता था, वह लोगों के लिए अचानक ‘हीरो’ हो गई। जिन जनप्रतिनिधियों की नजर में गायत्री की बातों की कोई अहमियत नहीं थी, उन्हें उसकी बातें महान लगने लगी। जिस रिस्पना की बदहाली का गायत्री ने जिक्र किया उसके प्रति सहानुभूति की बाढ़ सी आ गई। जो सिस्टम रिस्पना और बिंदाल की दुर्दशा के लिए बहुत हद तक खुद जिम्मेदार है, वह उसके कायाकल्प की फिक्र करने लगा। लेकिन यह फिक्र इस लिए कतई नहीं की जा रही है कि जिम्मेदार लोगों को कोई ‘आत्मबोध’ हुआ हो, बल्कि इसलिए क्योंकि मोदी ने मन की बात में इसका जिक्र किया। वरना यदि आत्मबोध हुआ होता तो सबसे पहले तो उन कारणों की पड़ताल होनी चाहिए थी जिनके चलते इन नदियों की ये हालत हुई है।

नदियों की इस हालत के पीछे उनमें कराया जाने वाला अतिक्रमण, उनमें गिराया जाने वाला कूड़ा, वहां होने वाला अनियोजित विकास तथा वोटबैंक की खातिर उनके इर्द-गिर्द बसाई गई रिहायश सबसे अधिक जिम्मेदार है। ये सब इसी सिस्टम की देन हैं, जो आज खुद को इतना व्याकुल दिखा रहा है। बहरहाल ये स्थित विचित्र है और चिंताजनक भी। यह ‘जनतंत्र’ पर ‘भीड़तंत्र’ के भारी होने का प्रमाण है, और ये भीड़ किस तरह ‘हांकी’ जाती है ये भी इससे पता चलता है।

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